BIG NEWS :“चार साल की मासूम ने पार किए बर्फीले पहाड़, डेढ़ साल के नन्हें कदम भी पहुंचे बाबा केदार के दरबार… आस्था, संघर्ष और विश्वास से भरी चारधाम यात्रा बनी जिंदगी की सबसे पावन पूंजी”,पढ़े यात्रा संस्मरण (राजू नागदा "दास्सा")

नीमच। सनातन संस्कृति की सबसे पवित्र और कठिन मानी जाने वाली चारधाम यात्रा जब श्रद्धा, विश्वास और परिवार के साथ पूरी होती है, तो वह केवल यात्रा नहीं बल्कि जीवन का अविस्मरणीय अध्याय बन जाती है। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री की कठिन राहों को पार कर लौटे राजू नागदा “दास्सा” ने अपने यात्रा संस्मरण साझा करते हुए बताया कि यह सफर आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला अद्भुत अनुभव रहा।

पुष्कर जी, मेहंदीपुर बालाजी, मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार में गंगा स्नान और ऋषिकेश से शुरू हुई इस पावन यात्रा में जहां एक ओर ऊंचे पहाड़, दुर्गम रास्ते, बारिश और बर्फबारी जैसी चुनौतियां सामने आईं, वहीं दूसरी ओर बाबा के प्रति अटूट श्रद्धा ने हर कठिनाई को आसान बना दिया।

यात्रा को सफल और व्यवस्थित बनाने में अंकित शर्मा और उनकी टीम की भूमिका को विशेष रूप से सराहा गया। यात्रा के दौरान हर दर्शनार्थी के चाय-नाश्ते से लेकर भोजन प्रसादी तक का विशेष ध्यान रखा गया और पूरे सफर में पारिवारिक अपनापन महसूस कराया गया।

इस कठिन यात्रा की सबसे खास बात रही दो नन्हें दर्शनार्थियों की मौजूदगी। चार साल की आराध्या नागदा “अक्षु पंडित” और डेढ़ साल के नक्श नागदा “नक्षु पंडित” ने भी कठिन पहाड़ी रास्तों को पार कर चारधाम के दर्शन किए। नन्हें बच्चों के इस साहस और आस्था ने सभी यात्रियों को भावुक कर दिया।

हालांकि यात्रा के दौरान केदारनाथ की बर्फीली ऊंचाइयों पर ऑक्सीजन की कमी के कारण मंगलेश नागदा और छोटी आराध्या को परेशानी का सामना करना पड़ा। बाद में केदारनाथ धाम स्थित सरकारी अस्पताल में दोनों को ऑक्सीजन दी गई। डॉक्टरों की सलाह के बाद देर रात बाबा केदार और शिखर के दर्शन कर आधी रात में वापस गौरीकुंड लौटकर विश्राम करना पड़ा।

वहीं यमुनोत्री की छह से सात किलोमीटर की कठिन चढ़ाई और बद्रीविशाल की ऊंची चोटियों पर पड़ती बर्फीली बारिश ने श्रद्धालुओं के धैर्य की कठिन परीक्षा ली। लेकिन वहां मौजूद गर्म कुण्ड में स्नान करने के बाद थकान और ठंड से राहत मिली और श्रद्धालुओं ने खुद को फिर ऊर्जा से भरपूर महसूस किया।

राजू नागदा “दास्सा” ने कहा कि यह यात्रा केवल भौगोलिक दूरियां तय करना नहीं थी, बल्कि विषम परिस्थितियों में धैर्य, विश्वास और भक्ति को महसूस करने का अनुभव थी। जब शरीर थक गया, मौसम ने परीक्षा ली और रास्ते कठिन हुए, तब बाबा की कृपा हर पीड़ा पर भारी पड़ती नजर आई।

“यह यात्रा अब जीवनभर की पावन स्मृति और आध्यात्मिक पूंजी बन चुकी है।”

???? जय बद्री विशाल… जय बाबा केदार…