BIG NEWS: नागदा नपा की जमीन पर चद्दरों की ‘दुकानदारी’! अधिकारियों की नाक के नीचे 5 शेड खड़े, बोले—हमें पता ही नहीं, पढ़े खबर
प्रति दुकान 1.08 लाख रुपए लेने का दावा; ठेकेदार के जरिए निर्माण के आरोप | काम रुकवाकर नोटिस की तैयारी, अब उठे कई बड़े सवाल
नागदा। नगर पालिका की जमीन... सामने नगर पालिका का पुराना भवन... और इसी जमीन पर लोहे के पाइप गाड़कर चद्दरों के शेड खड़े होते रहे। करीब पांच दुकानों का ढांचा तैयार होने लगा, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी जानकारी तब हुई जब मामला सामने आया।

पुराने बस स्टैंड क्षेत्र में सामने आए इस मामले ने नगर पालिका की निगरानी व्यवस्था और जमीन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला सामने आने के बाद अधिकारी मौके पर पहुंचे और निर्माण कार्य रुकवा दिया। अब संबंधित लोगों को नोटिस देने की बात कही जा रही है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—नगर पालिका की जमीन पर निर्माण शुरू होकर करीब पांच शेड खड़े होने तक जिम्मेदारों की नजर क्यों नहीं पड़ी?

पहले गुमटियां हटाईं... अब उसी जगह शेड कैसे?
पुराने बस स्टैंड क्षेत्र में नाला निर्माण के दौरान पहले से लगी गुमटियों को हटाया गया था। नगर पालिका का कहना था कि नाला निर्माण के लिए जगह खाली कराना जरूरी है।
नाला निर्माण के बाद करीब 10 ऐसे दुकानदारों को दोबारा दुकानें तैयार करने का अवसर दिया गया, जिनके साथ नगर पालिका का एग्रीमेंट बताया जा रहा है और जो किराया भी जमा करते हैं।

लेकिन अब उन्हीं स्थानों के आसपास एक दूसरा मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि पहले हटाई गई गुमटियों से जुड़े कुछ लोगों के लिए लोहे के पाइप और चद्दरों से नए शेड तैयार किए जा रहे थे।
यदि इन लोगों के साथ नगर पालिका का एग्रीमेंट नहीं है, तो फिर सवाल और गंभीर हो जाता है—
अगर अतिक्रमण था तो उसी जगह दुकान का नया रूप कैसे खड़ा हो गया?
अगर अतिक्रमण नहीं था तो पहले गुमटियां हटाई क्यों गईं?
और यदि जमीन नगर पालिका की है तो निजी तौर पर शेड खड़ा करने की अनुमति किसने दी?
1.08 लाख का ‘रेट’ किसने तय किया?
मामले में सबसे गंभीर दावा दुकानदारों द्वारा बताई जा रही 1 लाख 8 हजार रुपए की राशि को लेकर है।
दुकानदार सुभाष के अनुसार वे पुरानी गुमटी दोबारा रखना चाहते थे, लेकिन उन्हें ऐसा करने से मना किया गया। इसके बाद ठेकेदार के माध्यम से लोहे के पाइप और चद्दरों से नई दुकान तैयार कराने की बात हुई और इसके लिए 1.08 लाख रुपए ठेकेदार को देने का दावा किया गया है।

अब जांच में सबसे पहले इन सवालों का जवाब तलाशना जरूरी होगा—
1.08 लाख रुपए किस काम के लिए लिए गए?
राशि लेने का आधार क्या था?
क्या इसकी कोई रसीद दी गई?
क्या राशि नगर पालिका के खाते में जमा हुई?
यदि नहीं, तो रकम किसके पास गई?
नगर पालिका की जमीन पर शेड बनाने की अनुमति किसने दी?
इन सवालों का जवाब सामने आए बिना मामला साफ नहीं होगा।

नपाध्यक्ष प्रतिनिधि ओपी गेहलोत का नाम भी चर्चा में
दुकानदारों के अनुसार नपाध्यक्ष प्रतिनिधि ओपी गेहलोत की जानकारी में यह काम हो रहा था और ठेकेदार के माध्यम से शेड तैयार कराए जा रहे थे।
वहीं गेहलोत का कहना है कि नाला निर्माण के दौरान जिन लोगों की गुमटियां हटाई गई थीं, उन्हीं लोगों द्वारा उसी स्थान पर नई दुकानें बनाई जा रही हैं। उनका कहना है कि नगर पालिका इन दुकानों का निर्माण नहीं करा रही, बल्कि संबंधित लोग अपने स्तर पर निर्माण कर रहे हैं।
दोनों पक्षों के बयान सामने हैं, लेकिन जमीन नगर पालिका की होने के कारण निर्माण की वैधता और अनुमति की जांच नगर पालिका को ही करनी होगी।
नपा के अधिकारी बोले—‘हमें जानकारी नहीं’
प्रभारी सीएमओ एवं उपयंत्री रवींद्र मंडलोई ने बताया कि अतिक्रमण कर शेड बनाए जाने की जानकारी मिलने के बाद तत्काल काम रुकवा दिया गया है। संबंधित लोगों को नोटिस देने की कार्रवाई की जा रही है।
सीएमओ सतीश मटसेनिया अवकाश पर होने के कारण उनका पक्ष नहीं लिया जा सका।

लेकिन यहां एक बड़ा सवाल फिर सामने खड़ा है—
नगर पालिका कार्यालय के सामने पाइप गड़ते रहे... चद्दरें लगती रहीं... करीब पांच शेड तैयार होने लगे... फिर जिम्मेदारों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई?
सिर्फ नोटिस या होगी पूरी जांच?
फिलहाल नगर पालिका ने काम रुकवा दिया है। लेकिन मामला केवल निर्माण रोकने और नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
यदि जमीन नगर पालिका की है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि निर्माण की अनुमति किसने दी?
यदि अनुमति नहीं थी तो जिम्मेदारों के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी?
यदि शेड अवैध हैं तो क्या उन्हें हटाया जाएगा?
और सबसे अहम—1.08 लाख रुपए की राशि लिए जाने का दावा सही है तो उसकी रसीद, हिसाब और जिम्मेदारी कौन तय करेगा?
पुराने बस स्टैंड का मामला अब सिर्फ लोहे के पाइप और चद्दरों से बने शेड का नहीं रह गया है। यह मामला नगर पालिका की जमीन, अतिक्रमण, अनुमति प्रक्रिया और कथित राशि वसूली के गंभीर सवालों से जुड़ गया है।
अब असली परीक्षा नगर पालिका की—नोटिस से आगे बढ़ेगी कार्रवाई या ‘दुकानदारी’ का मामला फिर ठंडे बस्ते में जाएगा?
नगर पालिका की निष्पक्ष जांच से ही यह साफ हो सकेगा कि आखिर सरकारी जमीन पर ये शेड किसकी अनुमति से खड़े हुए, 1.08 लाख रुपए लेने का दावा कितना सही है और पूरे मामले की जिम्मेदारी आखिर किसकी बनती है।