NEWS: मनासा में कथा के विश्राम दिवस पर संत श्री कृष्णानंद जी का संदेश,‘संसार में कोई किसी को नहीं छोड़ता, भगवान पर भी लांछन लगता है’, पढ़े खबर
मनासा। अयोध्यापुरी धर्मशाला में चल रही कथा के विश्राम दिवस पर संत श्री कृष्णानंद जी ने सत्राजित की मणि और भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े प्रसंग की विवेचना करते हुए कहा कि “संसार में कोई किसी को नहीं छोड़ता, भगवान पर भी लांछन लगता है।” संत श्री ने कहा कि संसार की यही रीति है, जहां परिस्थितियों के अनुसार व्यक्ति के बारे में धारणाएं बन जाती हैं।
कथा प्रसंग सुनाते हुए संत श्री कृष्णानंद जी ने बताया कि सत्राजित ने भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना की। भगवान भास्कर प्रकट हुए और उन्होंने सत्राजित को मणि प्रदान की। उस मणि से प्रतिदिन सवा सेर सोना प्राप्त होता था। मणि मिलने के बाद सत्राजित के पास धन बढ़ने लगा।
मणि मिलने से पहले सत्राजित भक्ति में डूबा रहता था, लेकिन सोना एकत्रित होने लगा तो उसका ध्यान धन और उसकी सुरक्षा में लग गया। माला छूट गई, प्रार्थना छूट गई और भक्ति भी पीछे छूट गई। इन सबकी जगह अहंकार ने ले ली।
संत श्री ने बताया कि एक दिन सत्राजित मणि को गले में पहनकर राजसभा में पहुंचा। वह अपनी मणि का प्रभाव दिखाना चाहता था। भगवान श्रीकृष्ण उसके मन की स्थिति समझ गए। उन्होंने सत्राजित से कहा कि क्या वह मणि उन्हें दे देगा, लेकिन सत्राजित ने कोई उत्तर नहीं दिया और वहां से लौट गया।
कुछ समय बाद सत्राजित का भाई मणि को गले में पहनकर जंगल में शिकार करने गया। वहां एक शेर ने उसे मार दिया और मणि लेकर चला गया। बाद में एक रीछ ने शेर को मारकर मणि प्राप्त कर ली और उसे अपनी पुत्री जामवंती को दे दिया। जामवंती ने वह मणि अपने गले में पहन ली।
सत्राजित ने जब मणि अपने भाई के पास नहीं देखी तो उसके मन में विचार आया कि भगवान श्रीकृष्ण ने मणि मांगी थी, लेकिन उसने नहीं दी, इसलिए उसके भाई की हत्या कर कृष्ण ने मणि प्राप्त कर ली। उसने यह बात लोगों के बीच फैला दी और द्वारकाधीश भगवान श्रीकृष्ण पर भी लांछन लगा दिया।
संत श्री कृष्णानंद जी ने कहा कि “संसार में कोई किसी को नहीं छोड़ता, भगवान पर भी लांछन लगता है।” उन्होंने कहा कि यह संसार की रीति है और मनुष्य को ऐसे प्रसंगों से सीख लेते हुए अपने भीतर भक्ति एवं विश्वास बनाए रखना चाहिए।
सुदामा गरीब नहीं, खुश नसीब थे’
कथा के उत्तरार्द्ध में संत श्री ने सुदामा जी के लिए प्रचलित ‘गरीब’ शब्द को अनुचित बताते हुए कहा कि सुदामा गरीब नहीं, बल्कि खुश नसीब थे। जिन्हें स्वयं प्रभु की मित्रता प्राप्त हुई, वे गरीब कैसे हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान जिसके लिए स्वयं दौड़े चले आएं, वह व्यक्ति गरीब नहीं हो सकता, बल्कि सबसे बड़ा अमीर और भाग्यशाली है।
संत श्री ने कहा कि भगवान अपने भक्तों के लिए स्वयं चले आते हैं। प्रह्लाद, ध्रुव, शबरी और केवट के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति ऐसी होनी चाहिए कि भगवान स्वयं भक्त के पास चले आएं। उन्होंने बताया कि विदुर जी ने भगवान को बुलाया नहीं, बल्कि भगवान स्वयं उनके यहां गए।
संत श्री कृष्णानंद जी ने कहा कि भक्ति में विश्वास परम आवश्यक है। सुदामा जी के कथा प्रसंग के साथ भागवत कथा का विश्राम हुआ।